दस में से एक भारतीय महिला टीबी संबंधी रोग से ग्रसित

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नई दिल्लीः दुनिया में क्षयरोग (टीबी) से जुड़े 20 लाख से अधिक मामले हैं और इससे संबंधित मृत्यु दर के मामलों में भारत दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है। आम तौर पर टीबी का बैक्टीरिया फेफड़ों को प्रभावित करता है और गुपचुप तरीके से पूरे शरीर में फैल जाता है। इस प्रकार यह दूसरे चरण में किडनी, पेट, मस्तिष्क, यूटेरस तथा फेलोपियन ट्यूब तक को संक्रमित कर देता है। यदि कोई दंपती बच्चा पाने की हसरत रखता है तो उनमें से किसी को भी आनुवांशिक टीबी दोनों के लिए एक बड़ी चिंता का कारण होता है।

इंदिरा आईवीएफ हाॅस्पिटल, नई दिल्ली में आईवीएफ एक्सपर्ट डाॅ. आरिफा आदिल कहती हैं, “हालांकि इसके लक्षण पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं हो पाते हैं लेकिन यदि सही समय पर इसका पता नहीं चल पाए तो इसके दुष्प्रभाव स्पष्ट होने लगते हैं। यह संक्रमण यूटेरस तक फैल सकता है और एंडोमिट्रियम (गर्भकला) तक को पतला कर देता है जिस कारण भ्रूण के विकास में बाधा आने लगती है। महिलाओं में टीबी के बहुत कम लक्षण दिखने के कारण यह क्रोनिक रोग बन जाता है। ट्यूबल फैक्टर इनफर्टिलिटी और एंडोमिट्रियम की गड़बड़ी निःसंतानता का बड़ा कारण माना जाता है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में इसका संक्रमण अधिक पाया जाता है जिस कारण अनियमित मासिक धर्म, खून के साथ-साथ वैजिनल डिस्चार्ज या सहवास के दौरान बहुत ज्यादा दर्द तथा अचानक से पेड़ू में दर्द उठने जैसी समस्या आती है। यह स्थिति ओवेरियन सिस्ट्स, पीआईडी, अस्थानिक गर्भधारण या गुप्तांग कैंसर जैसी इसी तरह की अन्य स्त्रीरोग समस्याएं पैदा कर सकती है।”

आईसीएमआर के ताजा शोध बताते हैं कि आईवीएफ पद्धति के लिए आने वाली 50 फीसदी महिलाओं में गुप्तांग टीबी देखी गई है। 95 फीसदी से अधिक मामलों में देखा गया है कि यह संक्रमण फेलोपियन ट्यूब को 50 फीसदी एंडोमेट्रियम और 30 फीसदी अंडाशयों को प्रभावित करता है। वैसे तो यह रोग किसी भी आयुवर्ग (15-45 वर्ष) में पनप सकता है लेकिन इसकी औसत आयु 31 वर्ष मानी गई है। ज्यादातर मामलों में यह रोग अनंतस्पर्शी पाया गया या बहुत कम लक्षणों के साथ इसकी मौजूदगी देखी गई है। दिल्ली एनसीआर क्षेत्र के आंकड़े बताते हैं कि टीबी पीड़ित पांच में से एक महिला स्वाभाविक रूप से गर्भधारण करने में असमर्थ पाई गईं जिनकी संख्या 40 फीसदी है।

शहर के मशहूर गायनकोलाॅजिस्ट डाॅ. अरविंद वैद्य कहते हैं, “गुप्तांगों में टीबी की मौजूदगी का पता लगाना हालांकि मुश्किल होता है लेकिन कुछ तरीकों से इसकी पहचान की जा सकती है, मसलन फेलोपियन ट्यूब के टीबी से पीड़ित किसी महिला के टिश्यू, यूटेरस से एंडोमेट्रियल टिश्यू का सैंपल लेकर लैब में भेजा जा सकता है जहां कुछ समय बाद बैक्टीरिया बढ़ने के कारण इसकी जांच आसान हो जाती है। इसके निदान का सबसे भरोसेमंद तरीका ट्यूबक्लेस की पृष्ठभूमि का पता लगाना है जिससे डाॅक्टरों को लेप्रोस्कोपी में मदद मिलती है और वे इन संदिग्ध जख्मों की पुष्टि कर पाते हैं कि यह टीबी के कारण है या नहीं। हिस्टेरोसल्पिंगोग्राफी (एचएसजी) भी यूटेरस और एंडोमेट्रियम में असामान्यता की परख करने का बहुत उपयोगी तरीका है। क्रोनिक संक्रमण यूटेराइन की सुराख को भी संकुचित कर सकता है।”

इसका प्रभाव मासिक धर्म से निवृत्त हो चुकी महिलाओं में भी देखा जा सकता है जहां एंडोमेट्रियल असाध्यता के लक्षण प्रमुखता से देखे जाते हैं, मासिक धर्म से निवृत्ति के बाद रक्तस्राव और वेजिना से लगातार डिस्चार्ज जैसे लक्षण भी देख जा सकते हैं। इससे पीड़ित पुरुषों के मामले में भी यही स्थिति देखी गई है जहां स्पर्म क्वालिटी कम होने लगती है और एकाग्रता तथा गतिशीलता की कमी भी इसके लक्षण बयां कर देते हैं।

दवाइयों से टीबी का इलाज महिलाओं को एआरटी, आईवीएफ या आईयूवी के जरिये गर्भधारण करने में मदद कर सकता है जहां इसके दुष्प्रभाव को खत्म करने के लिए दवाइयां कारगर हो सकती हैं। आप भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर रहते हुए टीबी से खुद को बचा सकते हैं क्योंकि भीड़ में आप संक्रमित व्यक्तियों के नियमित संपर्क में रहते हैं। इसके अलावा उपयुक्त स्वास्थ्य सेवा का लाभ उठाते हुए और नियमित रूप से शारीरिक जांच कराते रहने और यदि संभव हो तो टीबी रोधी टीके लगवाने से इस रोग से बच सकते हैं।