कॉस्मेटिक्स भी बन सकते हैं इनफर्टिलिटी की वजह

0
नई दिल्ली 2017:  कॉस्मेटिक्स यानी सौंदर्य प्रसाधन सुंदरता को बढ़ाने और निखारने के काम आते हैं, यह बात तो सभी जानते हैं और सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल भी आमतौर पर इसी मकसद से किया जाता है, लेकिन इस बात की तरफ हम शायद ही कभी ध्यान देते हैं कि ये सौंदर्य प्रसाधन हम पर इतना गंभीर असर भी डाल सकते हैं कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इस बारे में किए गए गहन अध्ययन और शोध से कुछ चिंताजनक बातें सामने आईं हैं, जो सौंदर्य प्रसाधनों के गंभीर दुष्प्रभावों की तरफ इशारा करती हैं। कॉस्मेटिक्स को बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल्स महिलाओं के हारमोन्स और खासतौर से उनके रीप्रोडक्टिव सिस्टम पर गहरा असर डालते हैं। एनवायरनमेंटल केमिकल्स और रीप्रोडक्टिव फंक्शन पर उनका असर आजकल रीप्रोडक्टिव मेडिसिन के क्षेत्र में चर्चा का हॉट टॉपिक बना हुआ है। ज्यादातर कॉस्मेटिक्स, जिनमें नेल पॉलिशन, एंटी बैक्टीरियल साबुन, एंटी एजिंग क्रीम, हेयर स्प्रे और परफ्यूम्स आदि शामिल हैं, ये महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर गंभीर असर डालते हैं, क्योंकि उनमें कई बेहद विषैले और घातक केमिकल्स भी मिले होते हैं। नई दिल्ली स्थित इंदिरा आईवीएफ हास्पिटल के आई वी एफ एक्सपर्ट डॉ.निताशा गुप्ता का कहना है कि ‘हाल के सालों में महिलाओं में बांझपन, गर्भपात और अंडाशय की असामान्य तरीके से काम करने के पीछे कई तरह के प्रभावी एंडोक्राइन केमिकल्स की पहचान की गई है, जो महिलाओं के गर्भधारण की क्षमता को प्रभावित करते हैं। साबुन को सबसे प्रमुख किटाणुनाशक माना जाता है, मगर एंटीबैक्टीरियल सोप गर्भधारण की संभावना को भी कम कर सकते हैं। इस तरह के साबुनों में ट्राइक्लोसन नामक केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है, जो एंडोक्राइन को प्रभावित करके सीधे आपके हारमोन्स पर असर डालता है और रीप्रोडक्टिव सिस्टम में भी दखल देता है। साबुन, शैंपू और कंडीशनरों में इस्तेमाल होने वाले पैराबीन्स एक तरह के प्रिजर्वेटिव हैं, जो बैक्टीरिया को पनपने से रोकते हैं, लेकिन इनकी अधिक मात्रा गर्भधारण की क्षमता पर असर डाल सकती है, क्योंकि जब हारमोन्स का संतुलन बिगड़ने लगता है, तो उसकी वजह से स्वस्थ अंडाणु और स्वस्थ शुक्राणुओं के बनने की संभावना भी कम होती जाती है।’
इसके अलावा जो महिलाएं नियमित अंतराल पर नेल पॉलिश लगाती हैं, उनके लिए भी नेल पॉलिश में शामिल केमिकल्स चिंता का विषय हैं। नेल पॉलिश में ऐसे केमिकल्स का मिश्रण होता है, जो गर्भ पर असर डालने और गर्भधारण की क्षमता पर असर डालने के लिए जाने जाते हैं। कई तरह के ऑर्गेनिक कंपाउंड से बने ये केमिकल महिला और पुरुष, दोनों की प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकते हैं।
डॉ.निताशा गुप्ता बताती हैं, ‘पॉलिश रीमूवर्स में टॉक्सिक केमिकल्स होते हैं, जिनमें एसीटोन, मिथाइल मेथाक्राइलेट, टोल्यूनी, इथाइल एसिटेट आदि शामिल होते हैं। टोल्यूनी आमतौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला एक सॉल्वेंट है, जिससे नेल्स पर ग्लॉसी फिनिश आती है, मगर यह सीएनएस और रीप्रोडक्टिव सिस्टम को भी नुकसान पहुंचाता है। इसके अलावा फलाइट्स भी एक ऐसा केमिकल है, जो आमतौर पर हर तरह के सौंदर्य प्रसाधन में पाया जाता है और जो हारमोन लेवल को डिस्टर्ब करता है, प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है और गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के स्तन में मौजूद दूध में भी घुलमिल जाता है। नेल पॉलिश में पाया जाने वाला केमिकल टीपीएचपी (ट्राइफिनाइल फास्फेट) भी तुरंत डीपीएचपी (डाइफिनाइल फास्फेट) से मेटाबोलाइज्ड होकर महिलाओं में प्रजनन क्षमता से जुड़े जोखिम और समस्याओं को गंभीर स्तर तक बढ़ा सकता है।’
इन केमिकल्स के संपर्क में आने से गर्भपात का खतरा तो बढ़ता ही है, साथ ही ये गर्भ में पलने वाले बच्चे को भी शारीरिक और मानसिक रूप से प्रभावित कर सकते हैं और जन्म के समय बच्चे को शारीरिक या मानसिक डिफेक्ट होने की संभावना बढ़ जाती है। इनकी वजह से गर्भपात, प्रीमैच्योर बर्थ, जन्म के समय बच्चे का वजन बहुत कम होना, बच्चे को सुनने में दिक्कत होना और बच्चे के बर्ताव में दिक्कत के अलावा बच्चे के ब्रेन, किडनी और नर्वस सिस्टम के डैमेज होने का खतरा भी बना रहता है। डॉ.निताशा गुप्ता का कहना है कि  ‘इसीलिए हमें सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करने से पहले सेफ्टी के मुद्दे पर भी एक बार विचार कर लेना चाहिए। कॉस्मेटिक्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल प्रेग्नेंसी के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि रीप्रोडक्टिव सिस्टम पर इनके गंभीर असर के चलते गर्भधारण करने की संभावना भी बहुत तेजी से कम होती जाती है। हालांकि ऐसे में गर्भधारण करने के लिए आईवीएफ ट्रीटमेंट मददगार साबित होता है, लेकिन फिर भी सलाह यही दी जाती है कि इस तरह के घातक केमिकल्स से युक्त सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल कम से कम किया जाए। अगर गर्भधारण हो गया है, तब भी इनका इस्तेमाल कम से कम करें, क्योंकि इसकी वजह से न केवल गर्भपात होने की संभावना बनी रहती है, बल्कि जन्म लेने वाले बच्चे में भी कुछ कमियां सामने आ सकती हैं।’